

■ अंबाला से विशेष रिपोर्ट
अक्सर कहा जाता है कि मां की ममता की डोर कभी टूटती नहीं — चाहे वक्त की आंधी कितनी भी तेज़ क्यों न हो। अंबाला कैंट के कबीर नगर से लापता हुआ नौ साल का संजय इसकी सबसे जीवंत मिसाल बन गया है। करीब 29 साल बाद, अब 38 साल का हो चुका संजय, अपनी मां वीना की गोद में लौट आया है।
जिस बेटे को 1996 में मंदिर जाते हुए खो दिया था, उसी बेटे को अचानक दरवाजे पर देख वीना देवी की आंखें भर आईं। पहली बार में उन्हें विश्वास नहीं हुआ — लेकिन जब बेटे ने बचपन की बातें सुनाईं, तो मां की ममता ने कह दिया — “हां, यही है मेरा संजय।”

हर राखी पर फोटो को राखी बांधती रही बहन रजनी
संजय के जाने के बाद परिवार का हर त्योहार अधूरा था। उसकी बड़ी बहन रजनी हर रक्षाबंधन पर उसके फोटो को राखी बांधती रहीं। आंखों में कभी आंसू थे, तो कभी उम्मीद।
“मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी थी। जब उसे सामने देखा तो यकीन ही नहीं हुआ… जैसे वक्त थम गया हो,” — रजनी की आवाज़ भर्राई हुई थी।

मंदिर से चला, स्टेशन पहुंचा और 29 साल गुमनामी में बीते
9 साल की उम्र में संजय घर से मंदिर के लिए निकला था। खेलते-खेलते वह अंबाला कैंट रेलवे स्टेशन पहुंचा और एक ट्रेन में बैठ गया। ट्रेन चल पड़ी और संजय अनजान शहरों की ओर चला गया।
महीनों तक रेलवे स्टेशनों पर सोता रहा। घर का पता याद नहीं था। 2001 में वह आगरा पहुंचा, जहां एक ढाबे वाले दंपती ने उसे अपने साथ रख लिया। धीरे-धीरे वहीं ज़िंदगी चलने लगी। मेरठ और फिर ऋषिकेश शिफ्ट हुआ।
वहीं उसे राधिका मिली। दोनों ने 2009 में शादी की और अब उनके तीन बच्चे हैं। लेकिन दिल के किसी कोने में आज भी एक अधूरी तलाश ज़िंदा थी।

गूगल पर मिला सुराग, और फिर हुआ चमत्कार
एक दिन संजय को याद आया कि उसके घर के पास एक चौकी थी और उसके सामने एक दरगाह। यही सुराग लेकर उसने गूगल पर तलाश शुरू की।
जब ‘महेशनगर चौकी’ और सामने दरगाह को देखा, तो उसके अंदर कुछ टूटकर जुड़ गया।
वह फौरन अंबाला आया, गलियों में भटका, लोगों से पूछा। तभी एक महिला ने टोका — “किसे ढूंढ रहे हो?”
संजय ने कहा — “मैं वीना का बेटा हूं, कर्मपाल का बेटा।”
पहले तो वीना कुछ समझ नहीं पाईं। संजय ने जाने से पहले उन्हें अपना नंबर दे दिया। कुछ दिन बाद जब उन्होंने कॉल किया और संजय दोबारा लौटा, तो परिवार ने उसकी पहचान बचपन की बातों से की। सबको विश्वास हो गया — संजय लौट आया है।

“ये सपना है या सच?” — मां वीना की आंखों से बहती रही ममता
वीना देवी कहती हैं —
“उस दिन के बाद एक पल भी ऐसा नहीं बीता जब मैंने संजय को याद न किया हो। अब जब वो सामने है, तो लग रहा है कि भगवान ने मेरी पुकार सुन ली।”
वीना की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। बार-बार बेटे को छूकर देख रही हैं, गोद में बिठाकर उसके बालों में हाथ फेरती हैं — जैसे खोया हुआ बचपन फिर से मिल गया हो।
“मां की गोद की नींद अब पूरी हुई है” — संजय
संजय भी बेहद भावुक है।
“मैं हर दिन अपनी मां को मिस करता था। अब जब उनकी गोद में हूं, तो लगता है — 29 साल बाद मेरी नींद पूरी हुई है। अब कहीं नहीं जाऊंगा।”
एक बेटे की वापसी ने पूरे मोहल्ले को नम कर दिया
जिस दिन संजय घर लौटा, मोहल्ले में सन्नाटा और आंसू दोनों थे। कुछ लोगों की आंखों में खुशी थी, तो कुछ को यकीन ही नहीं हो रहा था कि 29 साल बाद एक गुमशुदा बेटा यूं लौट आएगा।
ममता की जीत, तकनीक की मदद
इस कहानी ने एक बार फिर साबित कर दिया है —
मां की ममता कभी हारती नहीं, और तकनीक अगर सही दिशा में इस्तेमाल हो तो चमत्कार भी होते हैं।
गूगल मैप और याददाश्त के धागों ने 29 साल पुराने रिश्तों को फिर से जोड़ दिया।
