
अम्बाला छावनी के औद्योगिक ढांचे पर एक और कर और शर्तों का प्रहार:- चित्रा सरवारा
बेरोजगार युवाओं के पलायन के बाद अब नौकरी देने वाले उद्योग भी पलायन के मजबूर होंगे?
अम्बाला छावनी:- जब शासन जनसेवा के स्थान पर कर-संग्रह को अपना परम धर्म बना ले और मूलभूत आवश्यकताओं को दया नहीं, दंड का विषय मान लिया जाए, तब वह व्यवस्था नहीं, एक पीड़ादायक ढांचा बन जाती है। हरियाणा सरकार द्वारा आठ अप्रैल से लागू की गई नवीन विद्युत दर-व्यवस्था को लेकर नेत्री चित्रा सरवारा ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह नीति जनकल्याण नहीं, जनविरोध की परिभाषा है।
चित्रा ने कहा कि अब विद्युत कोई सहज, सुलभ सेवा नहीं रही, यह एक प्रकार का वित्तीय दंड बन चुकी है। यदि किसी घर का भार पाँच किलोवाट से अधिक है, तो उसे हर दो माह पर ₹900 से ₹2250 तक का स्थायी भार-शुल्क देना होगा, जो सीधा आर्थिक बोझ है। यदि मासिक खपत तीन सौ इकाई से अधिक हो, तो ₹50 प्रति किलोवाट प्रतिमाह अतिरिक्त भार लगेगा। इसका सीधा अर्थ है कि जो परिवार थोड़ा अधिक उपभोग कर रहे हैं, उन्हें अब उपभोग के लिए भी दंडित किया जा रहा है।
सरवारा ने व्यंग्य करते हुए कहा — “अब बिजली केवल दीप प्रज्वलन का साधन नहीं रही, यह राज्य के खजाने में पूर्ति का यंत्र बन चुकी है। मीटर अब सुविधा का उपकरण नहीं, कर-संग्रह की संदूक हो गया है। घरेलु बजट में आग लगाने का काम करेंगे नए बिजली के बिल”
उन्होंने कहा कि यह स्थिति अम्बाला छावनी में खास आघात कर रही है – अंबाला छावनी जो हरियाणा का एक प्रमुख औद्योगिक केन्द्र है — जहां यंत्र निर्माण,औषधि निर्माण,खेल सामग्री,विज्ञान उपकरण तथा अन्य विविध प्रकार की लघु एवं मध्यम उद्योग इकाइयाँ दशकों से कार्यरत रही हैं — आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। ये उद्योग व्यवस्था हज़ारों लोगों को नौकरी देती है और उतने ही घर चलाती है। राजस्व को हज़ारों करोड़ का योगदान है इस इंडस्ट्री का। आज नौकरी की कमी से युवाओं का पलायन चर्म पर है और ऐसे फैसलों के बाद नौकरी देने वाले उद्योग भी हरियाणा से चले जाएंगे।
चित्रा सरवारा ने कहा कि राज्य के कुल राजस्व में अम्बाला छावनी की औद्योगिक इकाइयों का योगदान सदैव अग्रणी रहा है, किंतु राज्य सरकार की नीति और दृष्टिकोण में इस क्षेत्र को वह मान्यता नहीं मिल रही, जिसकी यह अधिकारी है। जीएसटी की जटिलताएँ, बार-बार बदलते कर-नियम, नोट बंदी कोविड-काल की असमंजसपूर्ण बंदिशें और अब विद्युत दरों में बेतहाशा वृद्धि — इन सबने मिलकर अम्बाला की औद्योगिक ढांचे को तोड़ दिया है।
उन्होंने कहा — “जो अम्बाला छावनी कभी अंतरराष्ट्रीय पटल पर हरियाणा की पहचान हुआ करता था, आज वहाँ से उद्योग एक-एक करके पलायन कर रहे हैं। बेरोज़गारी बढ़ रही है, उत्पादन घट रहा है और शासन की उदासीनता दिन-ब-दिन गहराती जा रही है।”
चित्रा ने स्पष्ट किया कि उद्योगों को केवल भवन और भूमि नहीं चाहिए, उन्हें चाहिए स्थायित्व, सहजता, सरल कर प्रणाली और विश्वास — परंतु सरकार केवल शर्तें थोप रही है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अंबाला छावनी की औद्योगिक इकाइयाँ जो अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक गुणवत्ता व उत्पादन क्षमता रखती थीं, अब पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में पलायन कर रही हैं, जहाँ नीति में स्थायित्व और प्रक्रिया में सरलता है।
सरवारा ने अंत में कहा —
“यह केवल बिजली की दर नहीं, यह एक चेतावनी है। यदि शासन नहीं जागा, तो अंबाला छावनी की साइंस उद्योग एक दिन इतिहास का विषय बनकर रह जाएगी। सरकार को चाहिए कि वह विद्युत व्यवस्था की पुनर्समीक्षा करे, उद्योगों के लिए पृथक प्रोत्साहन योजना लागू करे और अंबाला छावनी को उसके योगदान के अनुरूप आदर व संरक्षण प्रदान करे।”
